
चेजिंग बतार्फ्ली जैसी documentary फिल्में बनाने वाbे गुरमीत वाइल्ड life फिल्मों में दिल चस्पी रखते हैं। वे युवा हैं और पूरे जोश के साथ काम भी करते हैं और साथ ही जिंदगी को एंजॉय भी करते हैं. रांची में सीएमएस वातावरण फ़िल्म festival के दौरान उनसे mulakat हुई. उन्होंने नयी पीढ़ी के निर्देशकों को एक्सपेरिमेंट व क्रियेटिविटी दिखाने के लिए प्रेरित किया. वाक द टॉक में इस बार गुरमीत सपल से मिलिए
अनुप्रिया अनंत
जानवर रंगों से distract होते हैं, जबकि titliya रंगों से आकर्षित होती हैं. तितिliyo को अगर अपने कैमरे में कैद करना चाहते हैं तो हमें समय का खास ख्याl रखना होगा. यानी कोई भी फिल्म रिसर्च या धैर्य के बगैर नहीं बन सकती. चेजिंग baterfly, leyopard द lurch , lad द्दाख 29 व ऐसी कई वाइल्ड life फिल्में बना चुके गुरमीत sapal ऐसा ही मानते हैं. वे एक ऐसे युवा फिल्ममेकर हैं, जिनकी फिल्में डिस्कवरी, नेशनl जियोग्राफिक व विभिन्न ग्रीन फिल्म festival का हिस्सा बन चुकी हैं. पिछले दिनों उन्होंने खास बातचीत में बताया कि देहरादून में बचपन बिताने के कारण प्रकृति से जुड़े रहने का मौका मिले इसलिए इस ओर मेरी रुचि बढ़ी. मेरा मानना है कि फिल्म कंसेप्ट से बनती है. तकनीक से नहीं. अगर आपको पता है कि आपको क्या कहना है, किसे कहना है और कहां कहना है तो आप तसवीरों के माध्यम से भी फिल्में बना सकते हैं. उनका मानना है कि डॉक्यूमेंटri फिल्मों का भविष्य बेहद ujjawal है. गुरमीत ने देहरादून से ग्रेजुएशन पूरा करने के बाद आइआइएमसी, delhi से रेडियो व television विजन ब्रॉडकास्टिंग कोर्स पूरा किया. इसके बाद उन्होंने कई टीवी कार्यक्रर्मों में एसोसियेट प्रोडयूसर के रूप में काम किया. मीडिया में कुछ salo के अनुभव के बाद इनके तीन दोस्तों ने मिलकर गुप्र तैयार किया और अब वे फिल्में बनाते हैं. गुरमीत का मानना है कि अगर आपकी फिल्में अच्छी होंगी तो फंड का इंतजाम जरूर हो जायेगा. गुरमीत की film को सीएम वातावरण अवार्ड भी मिल चुका है. aanewale समय में वह फीचर फिल्म बनाने की भी इच्छा रखते हैं. वाइल्ड life फिल्में बनाने के दौरान कभी चोट नहीं आयी, यह पूछने पर वह बताते हैं कि alert रहता हूं, छोटी-मोटी चोटें तो आती हैं. वैसे भी जंगbी जानवरों से अधिक छोटे-छोटे मच्छर अधिक तंग करते हैं. फिल्म मेकिंग के साथ-साथ इन्हें behatariin photography करने का भी शौक है. वे फिल्ममेकिंग पृथ्वी की सबसे रोमांचकारी दुनिया मानते हैं.
जानवर रंगों से distract होते हैं, जबकि titliya रंगों से आकर्षित होती हैं. तितिliyo को अगर अपने कैमरे में कैद करना चाहते हैं तो हमें समय का खास ख्याl रखना होगा. यानी कोई भी फिल्म रिसर्च या धैर्य के बगैर नहीं बन सकती. चेजिंग baterfly, leyopard द lurch , lad द्दाख 29 व ऐसी कई वाइल्ड life फिल्में बना चुके गुरमीत sapal ऐसा ही मानते हैं. वे एक ऐसे युवा फिल्ममेकर हैं, जिनकी फिल्में डिस्कवरी, नेशनl जियोग्राफिक व विभिन्न ग्रीन फिल्म festival का हिस्सा बन चुकी हैं. पिछले दिनों उन्होंने खास बातचीत में बताया कि देहरादून में बचपन बिताने के कारण प्रकृति से जुड़े रहने का मौका मिले इसलिए इस ओर मेरी रुचि बढ़ी. मेरा मानना है कि फिल्म कंसेप्ट से बनती है. तकनीक से नहीं. अगर आपको पता है कि आपको क्या कहना है, किसे कहना है और कहां कहना है तो आप तसवीरों के माध्यम से भी फिल्में बना सकते हैं. उनका मानना है कि डॉक्यूमेंटri फिल्मों का भविष्य बेहद ujjawal है. गुरमीत ने देहरादून से ग्रेजुएशन पूरा करने के बाद आइआइएमसी, delhi से रेडियो व television विजन ब्रॉडकास्टिंग कोर्स पूरा किया. इसके बाद उन्होंने कई टीवी कार्यक्रर्मों में एसोसियेट प्रोडयूसर के रूप में काम किया. मीडिया में कुछ salo के अनुभव के बाद इनके तीन दोस्तों ने मिलकर गुप्र तैयार किया और अब वे फिल्में बनाते हैं. गुरमीत का मानना है कि अगर आपकी फिल्में अच्छी होंगी तो फंड का इंतजाम जरूर हो जायेगा. गुरमीत की film को सीएम वातावरण अवार्ड भी मिल चुका है. aanewale समय में वह फीचर फिल्म बनाने की भी इच्छा रखते हैं. वाइल्ड life फिल्में बनाने के दौरान कभी चोट नहीं आयी, यह पूछने पर वह बताते हैं कि alert रहता हूं, छोटी-मोटी चोटें तो आती हैं. वैसे भी जंगbी जानवरों से अधिक छोटे-छोटे मच्छर अधिक तंग करते हैं. फिल्म मेकिंग के साथ-साथ इन्हें behatariin photography करने का भी शौक है. वे फिल्ममेकिंग पृथ्वी की सबसे रोमांचकारी दुनिया मानते हैं.

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