Tuesday, February 24, 2009
काश किसी के अन्दर न हो काला बन्दर
हर मोर पर। हर चौक पर खरा है एक काला बन्दर। धर्म के नाम पर दंगा भरकाने वाला है वह काला बन्दर। अफवाह फैलाकर दूसरो का अमन चैन लूट लेने वाला है वोह काला बन्दर। सूरज की रोशनी में भी चारो तरफ लाशें बिछाने वाला है वो काला बन्दर। किसी की मुस्कान चिनकर ठहाके लगाने वाला है वो कला बंदर। मौत के समंदर को दोनों हाथो से गले लगाने वाला है वो काला बन्दर। आपके मेरे हम सबके जेहन में वहम को ता उमर जिन्दा रखने वाला है वो काला बन्दर। हम सब उससे डरते है। पर फिर भी उसे जिन्दा रखते है। क्युकी हम सब में कही न कही छुपा बैठा है वो काला बन्दर। राकेश ओमप्रकाश महरा की नई फ़िल्म डेल्ही-६ कुछ यही कहानी कहती है। यह डेल्ही-६ का फ़िल्म रिवु नही। बल्कि फ़िल्म देखने के बाद एक फ़िल्म के मुक्य उदेश्य को आम लोगो तक पहुचना है। खासतौर से युवाओ तक। क्युकी युवा ही आने वाले समय में हमें इस काले बन्दर के च्नागुल से बचा सकते है। फ़िल्म ने वाकुई एक नई कहानी कही है, जिसका हकीकत से सीधा सरोकार है। डेल्ही -६ मुझे दोकुद्रमा लगी। यानि वास्तविकता को मेलोड्रामा के साथ पेर्जेंट किया गया है। फ़िल्म में काला बन्दर किसी काले बन्दर को नही बल्कि उस वक्ती को सिम्बोल्य्ज़े करता है जो हिंसा के पुजारी हैं। जो आपकी जिंदगी में खौफ पैदा करना चाहते है। agar ham sab ek dusare se pyar karte hai to ham kabhi is bandar ke irado ko kamyab nahi hone denge. aaye din dharm ke naam par, परम्परा के नाम पर ढोंग करने वालो को मुह तोर जवाब देंगे। कोशिश करके देखिये तो वो काला बन्दर कभी आपके आस पास भी नही बत्केगा। डेल्ही-६ की तरह ही आम लोग भी मासूम हैं । वे इस घिनौनी चलको नही समग पते। और धोका खा जाते है। पर अगर हम हमेशा अपने अन्दर के अच्छे इंसान को जगा कर rakhe to syad wo kala bandar ham khokla nahi kar payega.
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