Sunday, January 2, 2011

झारखण्ड....एक दशक,क्या मिला क्या खोया

पूनम चौबे

एक ओर जहां हर तरफ लोग नये साल के आगमन पर नया संकल्प ले रहे हैं। कुछ नया करने की उम्मीद लिए अपनी पुरानी कमियों का दूर कर रहे हैं। वहीं अपना झारखंड, खनिज और वन-संपदा से भरपूर, देश का एक ऐसा राज्य, जो अपने गठन के दस साल पूरे करने के कगार पर है। विकास की अपार सभावनाओं का यह प्रदेश आज भी है इस पायदान पर, देश के 28 राज्यों में सबसे पीछे। आखिर क्या हुआ इन दस सालों के दौरान, जिसने रोक ली इस राज्य के विकास की रफ्तार। आईये जानें खुद इसकी जुबानी। विओ 1-चुप्पियों में हो रही तब्दीलधड़कनों वाली सभी शर्तें और हर उजली सुबह के साथ हादशों की खुल रही हैं परतेंमुट्ठियों में फड़फड़ाते दिनगीत-गंधी परकहंा तोले-कहां तोल-कहां तोलेप्रकृति की तमाम नेमतों से संपन्न धरती, जिस धरती में हमारे लिए भरी है खनिज संपदा की अकूत सौगात। आंखों को अपनी ओर खींचते दर्जनों जलप्रपात,वन-संपदा अपनी दोनों बाहों को पसारे आमंत्रित कर रही हर किसी को यहां की संस्कृति,सभ्यता और रीति-रिवाज। मानव समुदाय को सहकार भाव से सामुदायिक रुप से जीने की कला की प्रेरणा दिलाने वाले यहां के लोग,सूरज की पहली किरण के साथ, श्रम के संदेश और शुभ चांदनी रातों में मांदर की थाप पर उमड़ते लोगों का सरहद है, झारखंड।झारखंड, देश के इस बेमिसाल भूभाग को ब्रितानी सरकार ने अपना बंदी बनाने का और बंदी बनाकर संसाधनों को लूटने का देखा था सपना। लेकिन यहां के कोमल से दिखने वाले लोगों ने जिसमें आते हैं बिरसा मुंडा,सिद्धू-कान्हू,चांद-भैरव,टाना भगत और न जाने कितने योद्धा, जिनकी अगुवाई में अपनी शहादत देकर अपने राज्य और राष्ट्र की निष्ठा और एकजुटता का इतिहास रच दिया। देश आजाद हुआ, लेकिन आजादी के बाद के दशक से ही इस रत्न गर्भा भू-भाग के प्रथम पहचान की मांग उठने लगी। राम जयपाल सिंह मुंडा ने उलगुलान किया और लगभग साढ़े चार दशक के बाद झारखंड राज्य अपने सही आस्त्तिव में आया। यहां के लोगों ने न जाने कितने सपने,कितनी उम्मीदों और कितनी संभावनाऐं सजायीं। लेकिन इसके साथ ही शासन सत्ता और व्यवस्था पर काले डैने फैलाये मांसाहारी गिद्धों के जमघट ने इस नवजात शिशु रुपी राज्य को लहूलुहान करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। कुछ अपवादों को छोड़कर भ्रष्ट नौकरशाह,पदलोलुप राजनेता और ठेका पट्टा वाले माफियाओं और दलालों ने सारे सपनों ,उम्मीदों और संभावनाओं पर ग्रहण लगा दिया। महज नौ वर्षों में पांच मुख्यमंत्री,तीन बार राष्ट्रपति शासन,हजारों-हजार करोड़ की लूट का इतिहास रच दिया। अवाक और हताश हुए लोगों के हाथों में अपाहिज तर्कों के साथ थमा दिये गये हथियार। झारखंड का कोना-कोना, यहां की सुरंभ पहाड़ियां,दुर्गम लेकिन, मनोहारी जंगलों और पगडंडियों के बीच छा गयी, बारुदी गंध। आज नक्सलियों के कारण भी ठप पड चुका है राज्य का पूरा विकास। इतना ही नहीं जिस भाषा,संस्कृति,सम्मान और रोटी की गारंटी वाली मांग, दुवर््यवस्था की भेंट चढ़ गईं। पिछले दशकों में दो वक्त की रोटी के प्रलोभन पर यहां से .हांकी गई हजारों आदिवासी लड़कियों की गुमशुदगी, जल-जंगल-जमीन पर अधिकार की मांग की भेंट चढ़ गई। गैर वैज्ञानिक, बेतरतीब योजनाओं और परियोजनाओं से उपजे विस्थापन की पीड़ा, खुलेआम सत्ता के सौदे, राजकोष में ढींठता के साथ सेंधमारी, नयी पीढ़ी व विकास के बलत्कृत संदर्भ, राष्ट्रीय क्षितिज पर कालीख पोतते दिख रहे हैं। वहीं अपनी निजी उद्यम और दृढ संकल्पता के बूते जहां खेल की दुनिया में महेंद्र सिंह धोनी,सौरभ तिवारी, तो दूसरी ओर विद्यता और योग्यता के क्षेत्र में राम दयाल मुंडा जैसे अनेकों विभूतियां महिमा मंडित हो रहे हैं। तो शैक्षिक प्रतिस्पर्द्धा में यहां के छात्र, जिला-राज्यों की सीमा तोड़ते हुए, राष्ट्रीय स्तर पर लगातार अपना परचम लहरा रहे हैं।लेकिन प्रश्न ये है कि कौन है इन सारे विकास के क्षय का जिम्मेवार। किसने अपनी जागीर समझकर राज्य के विकास वाले डैनों को तोडा़-मरोड़ा है। हताशा-निराशा के ऐसे अध्याय लिखने वाले के आस्त्तिव पर कौन करेगा प्रहार। कब गायी जायेंगी राज्य में खुशहाली की लोरियां,कब शुरु होंगे विकास के स्पंदन,कब गूंजेंगी शहर से लेकर सुदूर गांवों तक विकास की किलकारियां, कब चमकेगा इस राज्य में विकास का सूरज। आइये, एक बार फिर बांधते हैं जोर से अपनी मुट्ठियां और हवा में हाथों को लहराकर जोर से करते हैं, उद्घोष इस नये साल में...‘जोहार झारखंड’ टूट कर बिखरे हुए जोदिख रहे सपनेमिल किसी के साथ फिरसाकार हम होंगे,साकार हम होंगे,साकार हम होंगे

Saturday, January 1, 2011

कौन देगा जवाब

POONAM CHOUBEY

कभी दुर्गा,कभी काली,कभी जगतजननी तो कभी दुखहरिणी। नाम तो उसे कई दिये गये हैं। लेकिन वो सत्यस्वरुपा,़ऋतंबरा है। अपने गमो को कहीं दूर छोड़ अपनों के लिए अपना सर्वश न्योछावार करने वाली किसी की मां, पत्नी,बेटी तो किसी की अर्द्धांगिनी है। कभी अपने घर की दहलीज छोड़ सितारों की दुनिया में अपने बलबूते अपने राज्य का नाम रौशन करने वाली कोई राहत तसलीम है,तो कभी अपने थिरकते कदमों से रियलिटीज शोज की बनी शान अलिशा और सौम्या रहती हैं। ये झारखंड की पहचान हैं। वहीं झारखंड जहां इंदु कथा सम्मान से नवाजी गई महुआ मांजी है,टा्रइबल सोसायटी के विकास के लिए हर कदम पर उनके हक के लिए जूझने वाली रोज केरकेट्टा है, तो एक छोटी सी चाय दुकान चलाने वाली चिंगारी अवार्ड से सम्मानित दयामनी बारला है। यहीं नहीं खनिज संपदाओं से परिपूर्ण इस धरती पर तीरंदाजी की धर्नुधर दीपिका रहती है, जो वर्ल्ड कप में सोने के पदकों पर अपना हक काबिज कर यहां का गौरव बढ़ाती है,तो वहीं सुदूर गांवों से आनेवाली ये घरेलु महिलाएं 32 सालों बाद होने वाले पंचायत चुनाव में 50 हजार पुरुष प्रत्याशियों के बीच 30 हजार सीटों पर अपना अख्तियार कायम करती है। जी हां,ये है वो झारखंड जो प्राकृतिक देनों से ही नहीं,बल्कि आधी आबादी के बीच गिनी जानेवाली उन तमाम वैसी शख्सियतों से भरा पड़ा है, जिनपर झारखंड को नाज है। जिन्होंने झारखंड को महज एक झाड़-झंखाड़ का प्रदेश भर नहीं रहने दिया,बल्कि भारत के बड़े-बड़े शहरों के बीच इसे एक अनोखी पहचान भी दिलाई है। लेकिन इससे इत्तर इसी झारखंड में छली जाती हैं बेंटियां। घर से निकलती तो हैं वो इस उन्मुक्त गगन में अपने स्वच्छंद विचारों को उड़ान देने के लिए। लेकिन कहीं ना कहीं उनके पर कतर दिये जाते हैं। उनकी चाह को उनकी फरियाद बना दिया जाता है। इस पुरुषप्रधान देश में अगर लोगों को कुछ नहीं मिलता उस स्त्री को उसके कर्तव्यों से दूर भगाने के लिए तो वार कर दते हैं उसकी अस्मिता पर। कर देते हैं उसकी लज्जा को तार-तार। और इस काम में झारखंड भी कहां पीछे कहां रहनेवाला है। जितनी उपलब्धियां इस राज्य की बेटियां इसे देती है। उसके बदले में ये राज्य दे देता है उन्हें वो तमाम जख्म, जिस पर मरहम लगाने के लिए शायद उसमें वो आवाज भी ना रहें,जिनकी बुलंदियों से उसने सपने देखे थे अपनी स्वच्छंदता के। अपने दमखम पर अपनों का सहारा बनने वाली इन बेटियों को क्यों इनके ही राज्य में मिलती है ऐसी बेमौत,घिनौनी मौत जिसकी कल्पना भी शायद उसके रोंगेटे खड़े कर दे,जिसने इनको धरती पर सृष्टि के निर्माण और विकास के लिए भेजा। आखिरकार क्यों नये साल के आगमन पर भी दरिंदगी की ये हद मिटाने का संकल्प हम नहीं लेते। क्यों साल के पहले दिन ही फिर एक बेटी की आबरु हो जाती है तार-तार। क्यों हैवानियत की हद कुछ यूं पार कर जाती है कि उस मासूम को अपना दर्द बयां करने के लिए भी ये जालिम जिदां नहीं छोड़ते। या फिर उसके चरित्र पर लगाये गये उस दाग को ये खुद उसकी जिंदगी ही लेकर धो देना चाहते हैं। क्या है इसका जवाब आपके पास...?

कौन देगा जवाब

कभी दुर्गा,कभी काली,कभी जगतजननी तो कभी दुखहरिणी। नाम तो उसे कई दिये गये हैं। लेकिन वो सत्यस्वरुपा,़ऋतंबरा है। अपने गमो को कहीं दूर छोड़ अपनों के लिए अपना सर्वश न्योछावार करने वाली किसी की मां, पत्नी,बेटी तो किसी की अर्द्धांगिनी है। कभी अपने घर की दहलीज छोड़ सितारों की दुनिया में अपने बलबूते अपने राज्य का नाम रौशन करने वाली कोई राहत तसलीम है,तो कभी अपने थिरकते कदमों से रियलिटीज शोज की बनी शान अलिशा और सौम्या रहती हैं। ये झारखंड की पहचान हैं। वहीं झारखंड जहां इंदु कथा सम्मान से नवाजी गई महुआ मांजी है,टा्रइबल सोसायटी के विकास के लिए हर कदम पर उनके हक के लिए जूझने वाली रोज केरकेट्टा है, तो एक छोटी सी चाय दुकान चलाने वाली चिंगारी अवार्ड से सम्मानित दयामनी बारला है। यहीं नहीं खनिज संपदाओं से परिपूर्ण इस धरती पर तीरंदाजी की धर्नुधर दीपिका रहती है, जो वर्ल्ड कप में सोने के पदकों पर अपना हक काबिज कर यहां का गौरव बढ़ाती है,तो वहीं सुदूर गांवों से आनेवाली ये घरेलु महिलाएं 32 सालों बाद होने वाले पंचायत चुनाव में 50 हजार पुरुष प्रत्याशियों के बीच 30 हजार सीटों पर अपना अख्तियार कायम करती है। जी हां,ये है वो झारखंड जो प्राकृतिक देनों से ही नहीं,बल्कि आधी आबादी के बीच गिनी जानेवाली उन तमाम वैसी शख्सियतों से भरा पड़ा है, जिनपर झारखंड को नाज है। जिन्होंने झारखंड को महज एक झाड़-झंखाड़ का प्रदेश भर नहीं रहने दिया,बल्कि भारत के बड़े-बड़े शहरों के बीच इसे एक अनोखी पहचान भी दिलाई है। लेकिन इससे इत्तर इसी झारखंड में छली जाती हैं बेंटियां। घर से निकलती तो हैं वो इस उन्मुक्त गगन में अपने स्वच्छंद विचारों को उड़ान देने के लिए। लेकिन कहीं ना कहीं उनके पर कतर दिये जाते हैं। उनकी चाह को उनकी फरियाद बना दिया जाता है। इस पुरुषप्रधान देश में अगर लोगों को कुछ नहीं मिलता उस स्त्री को उसके कर्तव्यों से दूर भगाने के लिए तो वार कर दते हैं उसकी अस्मिता पर। कर देते हैं उसकी लज्जा को तार-तार। और इस काम में झारखंड भी कहां पीछे कहां रहनेवाला है। जितनी उपलब्धियां इस राज्य की बेटियां इसे देती है। उसके बदले में ये राज्य दे देता है उन्हें वो तमाम जख्म, जिस पर मरहम लगाने के लिए शायद उसमें वो आवाज भी ना रहें,जिनकी बुलंदियों से उसने सपने देखे थे अपनी स्वच्छंदता के। अपने दमखम पर अपनों का सहारा बनने वाली इन बेटियों को क्यों इनके ही राज्य में मिलती है ऐसी बेमौत,घिनौनी मौत जिसकी कल्पना भी शायद उसके रोंगेटे खड़े कर दे,जिसने इनको धरती पर सृष्टि के निर्माण और विकास के लिए भेजा। आखिरकार क्यों नये साल के आगमन पर भी दरिंदगी की ये हद मिटाने का संकल्प हम नहीं लेते। क्यों साल के पहले दिन ही फिर एक बेटी की आबरु हो जाती है तार-तार। क्यों हैवानियत की हद कुछ यूं पार कर जाती है कि उस मासूम को अपना दर्द बयां करने के लिए भी ये जालिम जिदां नहीं छोड़ते। या फिर उसके चरित्र पर लगाये गये उस दाग को ये खुद उसकी जिंदगी ही लेकर धो देना चाहते हैं। क्या है इसका जवाब आपके पास...?

Thursday, May 21, 2009

Why India Survives?

हेमंत कुमार

For the whole world, India has always been a wonder। They surprise to see India’s diversity, cultures, ethnicity and its multielements, all around।Then Why India Survives? This big question is always there. You can give edge to china over India at economic and development front, but when it comes to the people’s rights and fair democracy, we are far better than any other country. We have the dirty practice of politics, that is a roadblock for the development process. We peoples support those spoilers, troublemakers, casticism and opprtunists in our democracy. Despite there odds, Why India Survives? The answer is here, 60% of the 714103070 voters have given the answer to this question. The clear mandate for a stable gov. was a dream for our country, but this time India has voted for stability, governance and development. Voters aspiration of growth has won over marrowness of their imagnination, created by those shrewd politicians. The mandate has given a new space to the youth of india, to give new vision, ideas and faces in politics. After decade of lost opportunity, we have found a new youth leader, We have found a new youth leader, who is now more mature to lead the aspiration of youth India. This young leader is more concerned about youths and rural India , who believes that only youth can change. The fate and face of India. Change is inevitable, when leaders think peoples as only their vote bank, when a party rules foe decades without making any developments and taking peoples for granted, when the politicians mix engineering with politics ( social-Engineering). Then through this democracy, peoples weed out those tactial leaders. These are the same peoples who live on Rs 62/- day, their childrens are malnourished and they have no entilement. But still they vote, a vote for hope, ahope for betterment. And this way, India works. US has an Obama as their change agent, but we have millions of Obamas ( electorates) who go for change, when its needed. For the world this election is a case study, to know Why India Survives.

Thursday, April 30, 2009

Young Indians want more comfort’

Article published in Mumbai Mirror
Challengers coach Ray Jennings questions his team’s mental toughness & flays Virat Kohli for his attitude

AMIT GUPTA IN DURBAN
In the inaugural season Royal Challengers did scarcely anything of note to challenge the derogatory tag of them being a Test side. A year later, despite a new skipper, they are scrapping at the bottom of the heap. Mumbai Mirror caught up with their coach Ray Jennings who, in a freewheeling interview, was extremely vocal about why the youngsters haven’t measured up to expectations. Why is it that so far things have not gone according to plan? We have played only six games. T20 is very marginal, you need a bit of luck and sometimes the best sides don’t win. There are some issues with the batting. There have been five first-ball dismissals and three secondball dismissals, which doesn’t happen in cricket too often but it has happened to us. Our fielding has let us down and hopefully in the next three game we can pull things back and get the momentum going our way. What do you make of the side? Look it is not a partying side. They have worked hard. There is no trouble in the team. The only thing that I am not happy with is the performance part. I hope players are more responsible in the middle. Pietersen (Kevin) playing the switch shot the other day was not ideal, given the team’s position. I haven’t had a problem with KP. At no time I got the impression that he doesn’t care. I just think he made the wrong decision but he should have gone for the switch hit in the 15th over. You need to look at the team and the fact that it’s not batting well. How do you react to the Test tag? Both Kumble (Anil) and Dravid (Rahul) were the highest wicket-taker and the most succcessful batsman respectively at some point in the tournament. Those two players can never be labelled as Test cricketers. If Kumble is a Test player than Shane Warne is one too. What has happened till now is that we haven’t had an international cricketer except Kallis who has gone past 50. I have loaded the batting with international players. Instead of making 60 in the first six overs, we are ending up making 40 and that has put us on the back foot. I don’t think our bowling has been bad except against Chennai. Have the international cricketers let you down? They should be our leaders both in runs and wickets. But here we have a situation where Dravid has been streets ahead of them all. At the start of the tournament he came in as one of the worst T20 batters but he has ended up as our best. How have you been managing some of the young Indian stars? Someone like Virat Kohli sometimes thinks he is better than the game. I need to put him down. He is a very talented player and needs to understand that he has to put performances on the field. If he doesn’t do it, I have to tell him to wake up. The younger Indian guys want more comfort. Some of the guys aren’t mentally tough enough. I keep challenging them. Take something away from Virat if he does something wrong. Kick out of maybe even Jacques Kallis. How are the players taking this? You got to ask them (behind my back) and see what they say (laughs). I am very comfortable where we are. I love the guys I am working with. They know they can’t push me around, they can’t party too much. I have done the right things as far as the cricket is concerned. The boys have prepared well. If I have a hard fielding session or talk tough with someone, I have my reasons and I let them know.

Friday, April 24, 2009

०९७०८६७४०७५- मिशन जागो युवा jaago

हा, इन्होने कोई पदक नही जीता, कोई बहुत बड़ा कामकरके नही दिखाया हैकोई कर्शिमा भी नही कियापर सायद फिर इन्होने जो किया, देश के हर युवा को करना चाहिएपर हम युवा करते नहीबात कर रहे है एक ऐसे युवा की जिसने वोट नही कियासिर्फ़ इसलिए क्युकी वो भी हजारो युवा की तरह अपने घर हाजीपुर से दूर रांची में पडी कर रहे हैपर उन्होंने जिस तरह अपने नेटवर्क के युवा मतदाताओ को २४ घनते जागरूक किया हैवो कबीले तारीफ़ हैहम या आप शयद सोच कर भी कर पायेक्युकी हम इन चीजों पर पैसे खर्च नही करना चाहतेहम अपने दोस्तों को समस के मध्यम से जोक्स भेज सकते है, लव मेस्सेगे भेज सकते हैपर जागरूक नही कर सकतेपर इस युवा नि जिस दिन से चुनावी बिगुल शुरू हुईइन्होने भी अपना अभियान शुरू कियाआईडिया मोबाइल काम समस पैक ( गौर करे वो फ्री नही था) । सुबह से रात के १२ बजे तक वे वोट करो दिसिदे यौर वोट से रेअल्तेद लगभग हजारो मेसेज किएकेवल एक दोस्त को नहीबल्कि अपने नेटवर्क के लगभग हर युवा दोस्त कोवोटिंग डे दिन भी मेरी नींद इनके इन्बोक्स में आए समस से ही खुलीहमारा इन्बोक्स बरता रहा, पर इनका मिशन चलता रहाआज के वक्त में जब हम युवाओ काम अधिकतर वक्त पैसा मौज मस्ती में बर्बाद होता हैएक युवा है जो किताबो, नेव्स्पपपेर्म, इन्तेराच्शन और सबसे अहम् दुसरो को जागरूक करने में यकीं रक्त हैएक साक्ष मेरे लिए सिर्फ़ खास नही अगर आप भी इनसे मिलना कहते है तो एक बार इस नोपर तरी करे आप खुद समझ जायेगेऔर एक खास बात उन्होंने मुझे अपनी तारीफ़ के पूल बंधने के लिए कोई पैसे नही दिएमई यह ब्लॉग उनकी मंजूरी के बिना ही लिक रही हूँआप सभी युवा दोप्स्तो कोई अगर किसी भी करंट अफेयर्स पर बात करनी हो तो बेझिझक इनसे बात करिएये है हेमंतयू स्पार्क की नज़र में वाकुई स्पार्किंग एंड मोस्ट अवाकेंदे युवासो, आर यू इन्तेरेस्तेद तो मीत हिम

युवा बोला चाहिए इन्टरनेट वोटिंग आप्शन

कल हॉस्टल में हम सभी लड़किया अपना पसंदीदा काम कर रही थी यानी गप्पे लड़ा रही थीपर अन्य दिनों की अपेक्षा कल हमारा टोपिक फिल्मी गॉसिप नही, वोट थाहा, यानी अब हम छोटे शेरो की लड़किया भी जागरूक हो गई है। जाहिर है, सभी लड़किया इस बात से दुखी थी की वोटिंग के लिए एलेजिब्ले होने के बावजूद वे इन्क्लुडिंग मैवोट नही कर पाईवजह हमारा वोटर ईद हमरे घर पर है। और हम यहाँ रांची मेफिर हम वोट कैसे कर पातीखुसी इस बात की हमारे हॉस्टल की लगभग साडी लड़किया बोगुस वोटिंग के ख़िलाफ़ थीनो वोटिंग आप्शन एंड नेगेटिव वोटिंग होताकि जिस umeedwaar हम elijible नही samjhte उसे हम नेगेटिव वोट कर सकेसभी अपना वोट करना चाहती थीतभी हम लड़कियों में एक ने कहा की it शूद be इन्टरनेट वोटिंग ऑप्शन्स फॉर asआख़िर यूथ वोटर का बार तबका इसी वजह से वोट नही कर पता क्युकी सभी हिघेर स्टडीज के लिए अपने घर से दूर होते हैइस लिए भारत के चुनाव आयुक्त को इन्टरनेट वोटिंग आप्शन रखना ही चाहिएमुझे भी बात में दम लगा, आकिर जब नेताओ को वेबसाइट के मध्यम से प्रमोशन करने का अधिकार है, वोट मागने का अधिकार है तो फिर वोट करने का आप्शन क्यों नहीसवाल में दम थासो दुसरे मैंने कमीशन की साईट सर्च कीसाथ ही अपने सीनियर से बात हुईउन्होंने बतया की घुमाकर मतदाताओ के लिए कोई कोई प्रवधान जरूर होगासाईट सर्च करोफिलहाल मे इस सवाल का जवाब धुन्धने में असफल हूँपर कोशिश जारी हैइस चुनावी गपसप में एक और मुद्दा निकलकर सामने आया की हम वोट दे किसेसबकोरक् ओबमा पसंद है वरुण गाँधी नहीसबनेइस बात पर सहमती थी की बराक ओबमा नि अपने भासन से ही वहां के लोगो को प्रभवित किया थाक्युकी उनके भासन में विकास की किरण नज़र रही थीपर हमारे भारत में अब भी युवा नेता अपने बगल के सिट पर बैठे मुस्लिम को नफरत की नज़र से ही देखते हैक्योंहमारे ही बीच एक लड़की नि कहा की मे मानती हूँ की हिंदुस्तान का मतलब हिंदू होना चैहिये.हम सभी लड़किया उस लड़की को ध्यान से देखने लगीकी क्या होगा हमारे युवा भारत का, जहाँ युवा ऐसी बर्कू सोच रखेगाउम्मीद और कोशिश तो यह हो की हम युवा खुद में किसी वरुण या मायावती को जन्म देफुट डाले, और हा, मुस्लिम मतलब आतकवादी, जैसे सोच को निकल बहार फेकेबात सयद गुप्सुप की तरह ही चल रही थीपर चाय की चुस्कियों के बीच कुछ अहम् और गंभीर सवाल निक्कालकर सामने आए जिसे हम नजरंदाज़ नही कर सकतेनही तो सयद इस बार की तरह हम युवा आनेवाले पीरी को अगले चुनाव तक भारत में किसी ओबमा को जन्म देने के लिए प्रेरित नही कर पायेगेहा, ये सच है १६वि लोकसाभाचुनाव यानी अगली चुनाव में हम में से कई युवा की शादी हो जायेगी, कई युवा श्रेणी से बहार हो जायेगेहमने इस बार जो मौका खोया, अगली बार वही सबने कुछ हम युवाओ की अगली श्रेणी के लिए नही होने देंगेऐसा अभी से सोचना शुरू करना होगा, तभी हम अगली चुनाव में युवा साँस ले पायेगेतब तक के लिए इन आप सो जाए सोचेक्युकी वो सुबह कभी तो आएगी जब अम्बर झूम के नाचेगा और धरती नगमे जायेगी