POONAM CHOUBEY
कभी दुर्गा,कभी काली,कभी जगतजननी तो कभी दुखहरिणी। नाम तो उसे कई दिये गये हैं। लेकिन वो सत्यस्वरुपा,़ऋतंबरा है। अपने गमो को कहीं दूर छोड़ अपनों के लिए अपना सर्वश न्योछावार करने वाली किसी की मां, पत्नी,बेटी तो किसी की अर्द्धांगिनी है। कभी अपने घर की दहलीज छोड़ सितारों की दुनिया में अपने बलबूते अपने राज्य का नाम रौशन करने वाली कोई राहत तसलीम है,तो कभी अपने थिरकते कदमों से रियलिटीज शोज की बनी शान अलिशा और सौम्या रहती हैं। ये झारखंड की पहचान हैं। वहीं झारखंड जहां इंदु कथा सम्मान से नवाजी गई महुआ मांजी है,टा्रइबल सोसायटी के विकास के लिए हर कदम पर उनके हक के लिए जूझने वाली रोज केरकेट्टा है, तो एक छोटी सी चाय दुकान चलाने वाली चिंगारी अवार्ड से सम्मानित दयामनी बारला है। यहीं नहीं खनिज संपदाओं से परिपूर्ण इस धरती पर तीरंदाजी की धर्नुधर दीपिका रहती है, जो वर्ल्ड कप में सोने के पदकों पर अपना हक काबिज कर यहां का गौरव बढ़ाती है,तो वहीं सुदूर गांवों से आनेवाली ये घरेलु महिलाएं 32 सालों बाद होने वाले पंचायत चुनाव में 50 हजार पुरुष प्रत्याशियों के बीच 30 हजार सीटों पर अपना अख्तियार कायम करती है। जी हां,ये है वो झारखंड जो प्राकृतिक देनों से ही नहीं,बल्कि आधी आबादी के बीच गिनी जानेवाली उन तमाम वैसी शख्सियतों से भरा पड़ा है, जिनपर झारखंड को नाज है। जिन्होंने झारखंड को महज एक झाड़-झंखाड़ का प्रदेश भर नहीं रहने दिया,बल्कि भारत के बड़े-बड़े शहरों के बीच इसे एक अनोखी पहचान भी दिलाई है। लेकिन इससे इत्तर इसी झारखंड में छली जाती हैं बेंटियां। घर से निकलती तो हैं वो इस उन्मुक्त गगन में अपने स्वच्छंद विचारों को उड़ान देने के लिए। लेकिन कहीं ना कहीं उनके पर कतर दिये जाते हैं। उनकी चाह को उनकी फरियाद बना दिया जाता है। इस पुरुषप्रधान देश में अगर लोगों को कुछ नहीं मिलता उस स्त्री को उसके कर्तव्यों से दूर भगाने के लिए तो वार कर दते हैं उसकी अस्मिता पर। कर देते हैं उसकी लज्जा को तार-तार। और इस काम में झारखंड भी कहां पीछे कहां रहनेवाला है। जितनी उपलब्धियां इस राज्य की बेटियां इसे देती है। उसके बदले में ये राज्य दे देता है उन्हें वो तमाम जख्म, जिस पर मरहम लगाने के लिए शायद उसमें वो आवाज भी ना रहें,जिनकी बुलंदियों से उसने सपने देखे थे अपनी स्वच्छंदता के। अपने दमखम पर अपनों का सहारा बनने वाली इन बेटियों को क्यों इनके ही राज्य में मिलती है ऐसी बेमौत,घिनौनी मौत जिसकी कल्पना भी शायद उसके रोंगेटे खड़े कर दे,जिसने इनको धरती पर सृष्टि के निर्माण और विकास के लिए भेजा। आखिरकार क्यों नये साल के आगमन पर भी दरिंदगी की ये हद मिटाने का संकल्प हम नहीं लेते। क्यों साल के पहले दिन ही फिर एक बेटी की आबरु हो जाती है तार-तार। क्यों हैवानियत की हद कुछ यूं पार कर जाती है कि उस मासूम को अपना दर्द बयां करने के लिए भी ये जालिम जिदां नहीं छोड़ते। या फिर उसके चरित्र पर लगाये गये उस दाग को ये खुद उसकी जिंदगी ही लेकर धो देना चाहते हैं। क्या है इसका जवाब आपके पास...?

No comments:
Post a Comment