पूनम चौबे
एक ओर जहां हर तरफ लोग नये साल के आगमन पर नया संकल्प ले रहे हैं। कुछ नया करने की उम्मीद लिए अपनी पुरानी कमियों का दूर कर रहे हैं। वहीं अपना झारखंड, खनिज और वन-संपदा से भरपूर, देश का एक ऐसा राज्य, जो अपने गठन के दस साल पूरे करने के कगार पर है। विकास की अपार सभावनाओं का यह प्रदेश आज भी है इस पायदान पर, देश के 28 राज्यों में सबसे पीछे। आखिर क्या हुआ इन दस सालों के दौरान, जिसने रोक ली इस राज्य के विकास की रफ्तार। आईये जानें खुद इसकी जुबानी। विओ 1-चुप्पियों में हो रही तब्दीलधड़कनों वाली सभी शर्तें और हर उजली सुबह के साथ हादशों की खुल रही हैं परतेंमुट्ठियों में फड़फड़ाते दिनगीत-गंधी परकहंा तोले-कहां तोल-कहां तोलेप्रकृति की तमाम नेमतों से संपन्न धरती, जिस धरती में हमारे लिए भरी है खनिज संपदा की अकूत सौगात। आंखों को अपनी ओर खींचते दर्जनों जलप्रपात,वन-संपदा अपनी दोनों बाहों को पसारे आमंत्रित कर रही हर किसी को यहां की संस्कृति,सभ्यता और रीति-रिवाज। मानव समुदाय को सहकार भाव से सामुदायिक रुप से जीने की कला की प्रेरणा दिलाने वाले यहां के लोग,सूरज की पहली किरण के साथ, श्रम के संदेश और शुभ चांदनी रातों में मांदर की थाप पर उमड़ते लोगों का सरहद है, झारखंड।झारखंड, देश के इस बेमिसाल भूभाग को ब्रितानी सरकार ने अपना बंदी बनाने का और बंदी बनाकर संसाधनों को लूटने का देखा था सपना। लेकिन यहां के कोमल से दिखने वाले लोगों ने जिसमें आते हैं बिरसा मुंडा,सिद्धू-कान्हू,चांद-भैरव,टाना भगत और न जाने कितने योद्धा, जिनकी अगुवाई में अपनी शहादत देकर अपने राज्य और राष्ट्र की निष्ठा और एकजुटता का इतिहास रच दिया। देश आजाद हुआ, लेकिन आजादी के बाद के दशक से ही इस रत्न गर्भा भू-भाग के प्रथम पहचान की मांग उठने लगी। राम जयपाल सिंह मुंडा ने उलगुलान किया और लगभग साढ़े चार दशक के बाद झारखंड राज्य अपने सही आस्त्तिव में आया। यहां के लोगों ने न जाने कितने सपने,कितनी उम्मीदों और कितनी संभावनाऐं सजायीं। लेकिन इसके साथ ही शासन सत्ता और व्यवस्था पर काले डैने फैलाये मांसाहारी गिद्धों के जमघट ने इस नवजात शिशु रुपी राज्य को लहूलुहान करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। कुछ अपवादों को छोड़कर भ्रष्ट नौकरशाह,पदलोलुप राजनेता और ठेका पट्टा वाले माफियाओं और दलालों ने सारे सपनों ,उम्मीदों और संभावनाओं पर ग्रहण लगा दिया। महज नौ वर्षों में पांच मुख्यमंत्री,तीन बार राष्ट्रपति शासन,हजारों-हजार करोड़ की लूट का इतिहास रच दिया। अवाक और हताश हुए लोगों के हाथों में अपाहिज तर्कों के साथ थमा दिये गये हथियार। झारखंड का कोना-कोना, यहां की सुरंभ पहाड़ियां,दुर्गम लेकिन, मनोहारी जंगलों और पगडंडियों के बीच छा गयी, बारुदी गंध। आज नक्सलियों के कारण भी ठप पड चुका है राज्य का पूरा विकास। इतना ही नहीं जिस भाषा,संस्कृति,सम्मान और रोटी की गारंटी वाली मांग, दुवर््यवस्था की भेंट चढ़ गईं। पिछले दशकों में दो वक्त की रोटी के प्रलोभन पर यहां से .हांकी गई हजारों आदिवासी लड़कियों की गुमशुदगी, जल-जंगल-जमीन पर अधिकार की मांग की भेंट चढ़ गई। गैर वैज्ञानिक, बेतरतीब योजनाओं और परियोजनाओं से उपजे विस्थापन की पीड़ा, खुलेआम सत्ता के सौदे, राजकोष में ढींठता के साथ सेंधमारी, नयी पीढ़ी व विकास के बलत्कृत संदर्भ, राष्ट्रीय क्षितिज पर कालीख पोतते दिख रहे हैं। वहीं अपनी निजी उद्यम और दृढ संकल्पता के बूते जहां खेल की दुनिया में महेंद्र सिंह धोनी,सौरभ तिवारी, तो दूसरी ओर विद्यता और योग्यता के क्षेत्र में राम दयाल मुंडा जैसे अनेकों विभूतियां महिमा मंडित हो रहे हैं। तो शैक्षिक प्रतिस्पर्द्धा में यहां के छात्र, जिला-राज्यों की सीमा तोड़ते हुए, राष्ट्रीय स्तर पर लगातार अपना परचम लहरा रहे हैं।लेकिन प्रश्न ये है कि कौन है इन सारे विकास के क्षय का जिम्मेवार। किसने अपनी जागीर समझकर राज्य के विकास वाले डैनों को तोडा़-मरोड़ा है। हताशा-निराशा के ऐसे अध्याय लिखने वाले के आस्त्तिव पर कौन करेगा प्रहार। कब गायी जायेंगी राज्य में खुशहाली की लोरियां,कब शुरु होंगे विकास के स्पंदन,कब गूंजेंगी शहर से लेकर सुदूर गांवों तक विकास की किलकारियां, कब चमकेगा इस राज्य में विकास का सूरज। आइये, एक बार फिर बांधते हैं जोर से अपनी मुट्ठियां और हवा में हाथों को लहराकर जोर से करते हैं, उद्घोष इस नये साल में...‘जोहार झारखंड’ टूट कर बिखरे हुए जोदिख रहे सपनेमिल किसी के साथ फिरसाकार हम होंगे,साकार हम होंगे,साकार हम होंगे
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