Wednesday, April 22, 2009

बुजुर्गो के चुनाव में युवा( दनिक जागरण का sampadakiya

पंद्रहवीं lokshabha की सूरत बदलने में युवा ही निर्णायक होंगे. शायद यह पहला अवसर है जब चुनाव में युवा मतदाताओं की संख्या सर्वाधिक है. आज युवाओं को रिझाने की hor बेवजह नही है. आंकडे साफ बताते हैं कि आज 18 वर्ष से 35 वर्ष तक युवा मतदाताओं की संख्या 25 करोर को पार कर गई है. आज यदि कुल 77.4 करोड मतदाता हैं तो उनमें हर चार में से एक मतदाता युवा है, जिसकी उम्र 29 वर्ष से भी कम है. अगर उम्र के इस वर्ग को 18 से 35 वर्ष तक विस्तार दे दिया जाए तो इन मतदाताओं की संख्या 50 फीसदी को पार कर जाती है. इसलिए इस चुनाव में यह उक्ति चरितार्थ होती दिखाई दे रही है कि भारत ही नहीं, यहां का चुनाव भी युवा हो रहा है. अगर हम 1952 में गठित प्रथम लोक सभा से 2004 तक की चौदहवीं lokसभा के सफर पर नजर dale तो आज के परिदृश्य में एक विरोधाभास भी स्पस्ट नजर आता है. कहने का अर्थ यह है कि पहली lokसभा में सांसदों की औसत उम्र 465 वर्ष थी, जो 2004 में चौदहवीं lokसभा के आते-आते बढकर 526 हो गई. कडवा सच यह है कि इस चुनाव में एक बार फिर मतदाता तो युवा होंगे, लेकिन उनके सामने सांसद को चुनने का ज्यादातर विकल्प बुजुर्ग नेताओं का ही होगा. बेशक राजनीति अनुभव मांगती है, लेकिन यह भी सच है कि पिछले 57 सालो में 14 लोकसभा के चुनाव संपन्न हूए और इस बीच विभिन्न राजनीतिक डालो के सैकडों की संख्या में घोषणा पत्र भी प्रकाशित हूए , लेकिन सारे राजनीतिक अनुभवों को दरकिनार करते hooye किसी ने भी युवाओं केवास्तविक मुद्दों, उनकी आशाओं और आकांक्षाओं से जुडे प्रश्नों को hal करने का प्रयास नहीं किया। पंद्रहवीं lokसभा से जुडे विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के घोषणा पत्र भी की आपूर्ति से लेकर युवाओं को मोबाइल और लैपटॉप देने तक सीमित होकर रहे गए. एक ओर छोटे नगर और कस्बों के युवाओं के सामने अच्छी शिक्षा और सम्मानजनक नौकरी पाने की चुनौती है तो दूसरी और मेट्रो से जुडे युवा हैं, जिनके सामने शाइनिंग इंडिया से जुडे अलग -अलग लक्ष्य हैं. समाज के आखिरी छोर पर आने वाले युवा भी हैं जो इस शाइनिंग इंडिया से विरक्त होकर आक्रोशित हैं, विचलित हैं और विद्रोह के लिए तैयार हैं. कहीं-कहीं वे राजनीतिक व्यवस्था से विद्रोह भी कर रहे हैं. युवा समाज का सबसे संवेदनशीलोन वर्ग है. यही कारण है कि युवाओं की सक्रिय भागीदारी समकालीन समाज में सामाजिक हलचल और राजनीतिक दिशाबोध का एक आवेगमय सूचकांक होती है, परंतु देखने में आ रहा है कि 1980 के दशक के बाद युवा राजनीति और युवा चेतना का सूचकांक राजनीतिक पटल से गायब हो गया है. आजादी की laडाई के दौरान युवा राजनीति स्वतंतंत्र संग्राम का हिस्सा रही है. इतिहास साक्षी है कि कांग्रेस को जन आन्दोलन बनाने और समाज में राजनीतिक चेतना लाने में रास्त्र ­भक्त युवाओं ने ही महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी. 20 सदी के शुरुआती दौर में जिस पीढी ने आदर्श, बलिदान और त्याग के उदाहरण प्रस्तुत किए थे उस जमात में बंगाल की अनुशी समिति, मास्टर सेन की विद्यार्थी क्रांतिकारी मंडी, पंजाब में करतार सिंह सरोपा, गंगा-जमुनी दोआबा में रामप्रसाद बिस्मिल और अशफाक उल्लाह और महाराï­ में वीर सावरकर जैसे युवा शामिल थे। इन सभी युवाओं के जीवन का अर्थ देशप्रेम की राजनीति करना था, परंतु जैसे-जैसे शिक्षा और शैक्षिक मूल्यों में गिरावट आती गई, उसी के अनुपात में युवा आन्दोलन का आचरण भी बदलता चला गया. 1965 के बाद पूरी दुनिया में युवा असंतोष उभरने से जहां पाकिस्तान, फ्रांस और थाईलैंड जैसे देश प्रभावित हूए वहीं भारत भी युवा आक्रोश से अछूता नहीं रहा. इसी युवा आक्रोश के तहत यहां भाषा को lekar कई आन्दोलन हूए . 1968 के बाद वामपंथी और समाजवादी पृष्टभूमि से जुडे कई जुझारू एवं संघर्षशील नेता उभरकर सामने आए. अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद उसी का खंड की देन है. युवाओं की शक्ति का अहसास करते हूए कांग्रेस ने भी 1968 में रास्ट्रीय छात्र संगठन बनाया. 1974 में जब बिहार में संपूर्ण क्रांति का नारा देने के लिए जयप्रकाश नारायण के यूथ फार डेमोक्रेसी के गठन ने छात्र -युवा आन्दोलन को एक नई दिशा दी. 1980 का दशक आते-आते राजनीतिक डालो के ध्रुवीकरण ने बदलाव का जो माहौल तैयार किया उससे युवा राजनीति भी उसका हिस्सा बन गई. राजनीति पर परिवारवाद और वंशवाद हावी होने laga. मंडल आयोग की सिफारिशों, जाति व धर्म से जुडी राजनीतिक घटनाओं, घोटाला , राजनीति में आपराधिक पृष्टभूमि के लोगो का प्रवेश और भाई-भतीजावाद जैसी घटनाओं ने युवा राजनीति का चेहरा कुपोषित कर दिया. (लेखक समाज शास्त्र के प्राध्यापक हैं)

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