विकास के नाम पर पुराने सिनेमाघर बंद किया जाना उचित नहीं
आइलेक्स की टिकट दरें आम आदमी की बजट से बाहर।
आम आदमी नहीं है आइlex का दर्शक वर्ग।
चाहे तो सिनेमाघरों की बिगड़ी छवि फिर से सुधर सकती है
पहले रतन, फिर विष्णु, उपहार और अब संध्या. रांची के लगभग ये सभी सिनेमा घर इतिहास के पन्नों में सिमट चुके हैं. मिनाक्षी भी अब उसी कगार पर है. यानी आम आदमियों के लिए अब रांची में सिनेमाघरों नामात्र के बच गये हैं. डेढ़ साल पहले रांची में मल्टीप्लेक्स का कंसेप्ट आया और आइलेक्स के रूप में रांची का पहला मल्टीप्लेक्स शुरू हुआ. इसके बाद मिनी सुजाता ने अपना रंग-रूप बदla और खुद को मिनीप्लेक्स में तब्दील कर डाला.. मेट्रो की तर्ज पर नये कॉम्पलेक्स व मल्टीपलेक्स की शुरुआत एक सकारात्मक पहल है. पर उसके एवज में आम आदमियों से उनके मनोरंजन का साधन छीना जाना कहां तक उचित है. गौरतlब है कि रांची में ऐसे भी मनोरंजन के साधन बहुत सीमित हैं. हर शुक्रवार नयी फिल्म की रिलीज़ के साथ ही आम आदमियों की इच्छा भी जागती है कि वे नयी फिल्में देखें और अपना मनोरंजन करे. पर धीरे-धीरे सिनेमाघर में फिल्में देखना उनके बजट से बाहर हो रहा है. रिक्शाचाlक, आटोचाlक व झुग्गी झोपड़ी व सड़कों व फुटपाथों पर काम करनेवाला वर्ग फिल्मों का एक बड़ा दर्शक वर्ग है. पर शायद, रांची के सिनेमाघर के मालिक इस बात को भूल गये हैं या फिर वे इस बात को tawazoo ही नहीं देना चाहते. तभी तो सामान्य दर की टिकट पर फिल्में दिखानेवाले सभी सिनेमाघर बंद हो चुके हैं या बंद होने के कगार पर हैं. विकास करना बुरा नहीं. पर उसके एवज में पुरानी धरोहरों को खत्म किया जाना कहां तक उचित, यह कह पाना मुश्किलोन है. आइलेक्स के टिकट की दरें आम आदमी की पहुंच से बाहर हैं. रियर स्टॉलोन में फिल्मों का आनंद उठानेवाले ये वर्ग पिछले कई वर्षों से सिनेमाघर के बंद होने की मार झेल रहे हैं. रांची का पहला सिनेमा घर वर्ष 1924 में बनवाया गया था. इसे छगनलाल सरावगी ने बनवाया था. बाद में इस सिनेमा घर को रांची के मजिस्त्रते kamal किशोर विश्वास ने खरीद गिया। बाद में इसका नाम बदल कर माया महल रखा दया. शचींद्रनाथ गांगुली ने बाद में इस हॉल का नाम बदल कर रूपा श्री रख दिया. रतन टॉकीज के स्थान पर पहले गुल सिनेमा हुआ करता था. वर्ष 1937 में इसका नाम बदल कर रतन टॉकीज किया दया. गांगुली परिवार के अधीन उस वक्त रांची के तीन सिनेमा घर थे. रतन टॉकीज, रूपा श्री व प्लाजा सिनेमा. प्लाजा में बंगला रतन में हिंदी व रूपा श्री में अंगरेजी फिल्में दिखाई जाती थीं. जो प्लाजा आज पूरी तरह उपेक्षित हो चुका है व केवल अश्लील फिल्मों के लिए जाना जाता है, कभी वहां लालपुर , बर्दवान कंपाउंड, सिर्कुलर रोड, पीएन बोस कमंपाउंड, हजारीबाग रोड, पीस रोड के निवासी दर्शक हुआ करते थे. पांचवे दशक के मध्य तक लोग सिनेमा देखना अच्छा नहीं मानते थे. रतन टॉकीज के बाद श्रीविष्णु टॉकीज की शुरुआत हुई जो अधिक दिनों तक नहीं चl पायी. वर्ष 1972 में दर्शकों को वातानुकूlit सिनेमा घर की प्रतीक्षा थी, जिसमें अधिक से अधिक सुविधाएं चाहिए थी. संध्या सिनेमा ने इसकी पूर्ति की. पर अब संध्या सिनेमा की टूटी फुटी इमारते ही अस्तित्व में रह गयीं और बहुत जल्द वह भी खत्म हो जायेगी. रांची के सिनेमा घरों की सबसे बड़ी त्रासदी यह रही कि यहां के संचाlaकों ने कभी यहां की साफ-सफाई या दर्शकों की पसंद व उनके आराम का ख्याल नहीं रखा. यहां तक की हॉल के सीटों की भी बदतर स्थिति है. माहौल तो पूरी तरह बदl चुका है. अब यहां रंगदारों का जमावड़ा अधिक हो गया है. जगह-जगह पर सिनेमा हॉl के दीवारों पर थूकना, शौचालाया में गंदगी, सीट पर गंदगी यहां के सिनेमा घर के स्तर को दर्शाते हैं. इन सिनेमाघरों के परदे व साउंड क्वालिटी भी बदतर है. संध्या, उपहार, मिनाक्षी व plaza सिनेमाघर कुछ ऐसे ही उदाहरण है. स्थिति को सुधारने की बजाय lagaतार सामान्य सिनेमाघरों को बंद किया जाना आम आदमी से उनके मनोरंजन छीना जाना है. इस संदर्भ में सुजाता व मिनी सुजाता ने खुद के स्वरूप बदlने व गुणवता को सुधारने में सकारात्मक पहb भी किये हैं. पर अब भी सीट व वहां की व्यवस्था रंगदारों के हाथों में होने के कारण bचर ही है. समय रहते रांची के सिनेमाघरों की स्थिति को सुधारना जरूरी है न की उन्हें बंद किया जाना, ताकि आम आदमी भी तनाव से मुक्त होने के bिए कम से कम अपने बजट में फिŸल्में देख पायें. साथ ही सिनेमाघरों की बिगड़ी छवि को सुधारने में भी पहb करने की जरूरत है. अगर कोशिश की जाये तो हम प्bाजा सिनेमाहॉb की खोयी छवि को उसे वापस bौटा सकते हैं. ढंगरा टोbी स्थित संध्या सिनेमा हॉb को टूटते देख आम आदमियों की एक टोbी की कुछ ऐसी ही मनसा थी. यहां तक की कॉbेज के कई छात्र-छात्राओं के bिए संध्या सबसे नजदीकी सिनेमाघर था, जहां आसानी से फिŸल्में देखी जा सकती थी. जरूरत है मनोरंजन के इन साधनों को संजोने की, न कि उन्हें सूbी पर चढ़ा कर नयी व आकर्षक इमारत खड़ा करने का. एक ऐसा इमारत जहां टिकट काउंटर पर bंबी कतार तो नजर आये, पर उसमें आम वर्ग के दर्शक नहीं.
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