आरजे अमित
झारखंड में फिल्म महोत्सवों को नहीं दी जाती तवाजो।
युवा फिल्ममेकरों की फिल्में बना रही हैं अन्त्ररास्त्रिया स्तर पर पहचान पर अपने ही घर में बेगाने।
आयिलेक्ष व सिनेमाघरों में फिल्मों की स्क्रीनिंग हों।
बॉलीवुड के फिल्म महोत्सवों का भी हो सकता है रांची में आयोजन
नागपुरी अश्लील एल्बमों ने बिगारी नागपुरी लोक संगीत की चवी
हाल ही में संपन्न हुए योर्कशायर आइफा अवार्ड के तुरंत बाद लन्दन में रहनेवाले एनआरआइ अजय गोयल ने एक ब्लॉग पर लिखा कि योकशार्यर अफ्रीका का छोटा सा काउंटी है, यानी वह एक जिला है, जहां आइफा अवार्ड जैसे भव्य कार्यक्रम का आयोजन हुआ। बॉलीवुड के कई जानी-मानी हस्तियां इसमें शामिल थीं। बिग वी व उनके परिवार का इस अवार्ड से लगाव जगजाहिर है। मुद्दे की बात यह है कि अफ्रीका क के एक छोटे से गांव में जब इतने बड़े समारोह आयोजित किये जा सकते हैं, इतना खर्च किया जा सकता है तो फिर हमारी रांची में क्यों नहीं। आश्चर्य न हो पर योर्कशायर से कहीं बेहतर स्थिति में है झारखंड की राजधानी रांची। न यहां केवल फिल्मों की शूटिंग के लिए अच्छे लोकाशंस हैं, बल्कि ऐसी कई चीजें हैं जो बॉलीवुड फिल्मों के लिए वरदान साबित हो सकती है. पर यहां की लचेर व्यवस्था, संस्कृति की फिल्मों के प्रति रुझान न होने के कारण झारखंड लिमेलिते में नहीं आ पा रही. फिल्में बनाने का जो चलन यहां हैं, वे केवल ठुमके व गीत ailbamo तक ही सिमट कर रह जाता है. यहां के अपकमिंग फिल्ममेकर जब भी यह कहते हैं कि वे फिल्में बनाते हैं. logo को लगता है कि वे नागपुरी ठुमके एल्बम बनाते होंगे। नागपुरी एल्बमों के अशलील गीतों के कारण ही इन दिनों फिल्मों की छवि धूमिल हो रही है. जबकि यहां स्तरीय फिल्में bananewale निर्देशकों की कमी नहीं है. युवा फिल्म मेकर डॉक्युमेंटरी फिल्मों के माध्यम से रास्ट्रीय व अंतरास्ट्रीय फिल्म महोत्सवों में धूम मचा रहे हैं. पर खुद उन्हें अपने घर में बेगानों की तरह तृत किया जाता है. पिचले दिनों झारखंड के युवा फिल्ममेरों को हाइlit करते हुए सिनेक्राफ्ट द्वारा फिल्म महोत्सव का आयोजन किया गया, जिसमें झारखंड के जेवियर्स कॉलेज व करीम सिटी व तारा प्रोडक्शन की कई फिल्में दिखायी गयीं. तीन दिनों तक चलनेवाले इस महोत्सव के माध्यम से युवा फिल्म मेकर फोकस में आये. उन्हें एक नया plateform मिla और रांची में पहli बार ओपेन फिल्म महोत्सव संपन्न हुआ. सिने क्राफ्ट की यह पहल सराहनीय है. छोटे स्तर पर ही सही इस कल्चर की शुरुआत कर फिल्म बनान्वाले युवा फिल्मकारों का नया आकाश मिला . पर अफसोस की बात यह है कि मीडिया में इसे लेकर कोई जागरूकता नहीं दिखी. हिंदी पट्टी के अखबारों ने इसे खास तावाजू नहीं दी. बात अगर दर्शकों की करें तो वे ही लोग शामिल थे, जिनकी फिल्में थी व गिने चुने मीडिया से जुड़े log शामिल हुए. आयोजकों से बातचीत करने पर पता चला कि उन्हें इस आयोजन में कई परेशानियों का सामना करना पड़ा. फंड एक बड़ी समस्या बनी. जबकि मेट्रो या जहां सिनेमा बनाने की संस्कृति है या जहां सिनेमा को केवल मनोरंजन की वस्तु नहीं समझा जाता , वहां हर महीने lagbhag शहर में दो से तीन फिल्म महोत्सव आयोजित किये जाते हैं, जिनमें नामचीन हस्तियां भी शिरकत करती हैं. खास बात यह कि फंडिंग की समस्या नहीं होती. साथ ही दर्शकों का वर्ग भी बड़ा होता है. पर रांची में ऐसे आयोजन को महत्व नहीं दिया गया. जामिया से वीडियो प्रोडक्शन की पढ़ाई कर रहे सौरभ की फिल्म मुस्कान स्मिले पिंकी से पहले बनी थी, पर जानकारी के अभाव में मुस्कान उस कीर्तिमान को नहीं छू पायी. यहां प्रतिभाओं की कमी नहीं. कई कंसेप्ट हैं, आइडिया है बन्नानेवाले भी कमल के हैं. पर सरकार की तरफ से इसके लिए कोई खास पहल नहीं है. झारखंड सरकार के संस्कृति विभाग को इससे कोई सरोकार नहीं. पुणे समेत ऐसे कई स्थान हैं जहां ऑनलाइन फिल्म महोत्सव आयोजित किये जा रहे हैं. सवाल यह उठता है कि यहां के फिल्मकारों द्वारा बनायी गयी फिल्म अंतररास्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाती है, पर अपने शहर में ही उसकी सूध लेनेवाला कोई नहीं. ऐसा क्यों. फिल्मों को लेकर अब तक रांची के दर्शकों की मानसिकता क्यों नहीं बदल रही? फीचर फिल्मों के alawa फिल्मों का आकाश बहुत ऊँचा है. इसे समझना होगा. jollywood की संस्कृति को तरोताजा रखने की पुरजोर कोशिश कुछ संस्कृति प्रिय log कर रहे हैं।, जिनमी सुधिल अंकन का वेबसाइट जोलिवूद झारखण्ड अहम् भूमिका निभा रहा है। वे इस धरोहर को बचाने की जुगत में लगे हुए हैं. पर इतना प्रयास ही काफ़ी नहीं है. हमें इस संस्कृति को गुमनामी के अंधेरों से बचाना होगा. हम अपना पलर सिर्फ यह कह कर नहीं झाड़ सकते कि दर्शक जो देखना चाहते हैं हम वहीं दिखाते हैं. यहां के सिनेमाघरों को सलाह में या महीने में एक बार ऐसी स्तरीय फिल्में जरूर lagai जानी चाहिए. कोशिश करके तो देखें, logon को जरूर पसंद आयेगी. झारखंड के सुप्रसिद्ध डॉक्युमेंटरी फिल्मकार मेघनाथ व बिजू टोप्पो का मानना है कि यहां के आइleक्स में महीने में एक बार यहां के निर्देशकों द्वारा बनायी गयी फिल्मों की स्क्रिनिंग की जानी चाहिए. साथ ही फिल्मों की मार्केटिंग पर भी विशेष रूप से ध्यान देना चाहिए. रोड शो व बैनर के माध्यम से loगों को जागरूक करना चाहिए. delli, मुंबई, पुणे में गali-गअली में शॉट फिल्में, सीरियl, नाटकों के बड़े-बड़े पोस्टर व बैनर लगाये जाते है , तो फिर हम यह प्रयास क्यों नहीं कर सकते. नागपुरी एlबमों की बिगड़ी छवि के कारण हम कई नागपुरी स्तरीय फिल्मों को भी नजरअंदाज कर देते हैं. समय-समय पर यहां का-संस्कृति विभाग द्वारा फिल्म महोत्सव आयोजित किये जायें, बकायदा उन्हें सम्मानित किया जाये और सरकार द्वारा उन्हें फिल्में बनाने के liye फंड पास किये जायें. उनसे प्रोपोजल्स मंगाये जायें और उन्हें आर्थिक मदद की जाये. अगर ऐसा हो निश्चित तौर पर यहां के फिल्ममेकर व फिल्में पहचान स्थापित कर पायेंगी. झारखंड की संस्कृति भी अपने आप में विकसित करेगी. डे सिका अवार्ड से नवाजे जा चुके विश्व के सुप्रसिद्ध भारतीय निर्देशक गौतम घोष जब एक अवार्ड फंक्शन में शरीक होने झारखंड आये तो उन्होंने कहा कि झारखंड खूबसूरत है, पर झारखंड केकलाकारों को नकl करने से बचना चाहिए, वे अपनी वास्तविकता को ही प्रेजेंट करें, खूबसूरत और नैचुरl होगा. साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि अभी बहुत कुछ सीखना बाकी है.झारखंड में पिछle तीन साlon से सिने अवार्ड्स का आयोजन किया जा रहा है. पर यह अर्वाड्स कम फैशन शो अधिक lगता है. फिल्म की और खूबसूरती को बचाये रखने के लिए हमें अपने राज्य की ka का सम्मान करना होगा और फिल्म मेकरों को प्रोत्साहित करना ही होगा. तभी आनेवाli पीढ़ी राज्य में इस कल्चर को बचा पाने में safal हो पायेगी.
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