Thursday, April 23, 2009
बात अगर हमारे भारत की हो तो यहां खेल , बिजनेस, फिल्मी सितारें और रियलिटी शोज में भाग लेने वालों की एक लम्बी फेहरिसत है. मगर हर रोज प्रशासन को कोसने और नेताओं को गली देने वाले यंगिस्तान के युवा इस बात से खुद को दूर ही रखना चाहते हैं कि भारतीय राजनीति में उनकी भी भागीदारी होनी चाहिए. भारत में जहां के 40फीसदी आबदी युवाओं को समर्पित है और इसी कारन इसे यंगिस्तान की की पदवी से नवाजा गया है, में सबसे बड़ी बिडंबना है कि यहां की लोकसभा और राज्यसभा में केवल उम्रदराजों की ही संख्या बढ़ती जा रही है। उदाहरण्ा के तौर पर जहां पहले लोक सभा में चुने गये सांसदों की उम्र 46 वर्ष के करीब थी वहीं इसके बाद तो मानों जैसे इनकी उम्र में इजाफा होने का बढ़ता ही गया. अरे हमारे पार्लियामेन्ट में तो ऐसे भी सांसद चुने गये हैं जिनकी उम्र 60 साल के करीब है. अब आप ही बताइये कब्र में पांव लटकाए ऐसे सांसदों से आप किस तरह के बदलाव की उम्मीद करते हैं. फिर भी उम्र को हम कोई तवज्जो नहीं देते अगर नेता दिल से जवां और अनुभवी हो. और लोक सभा व राजयसभा जैसी जगहों पर तो अनुभवी लोगों की ही मांग होती है इसलिए कुछ देर के लिए ये भी मान लेते हैं कि आप का उम्रदराज व्यक्ति चुनना ठीक है. कुछ लोगों का यह भी मानना है कि युवाओं को राजनीति के पचड़े में पड़ना गंवारा नहीं. युवा किसी राजनीतिक मुद्दे या बहस में पड़ने को एक खतरा मोल लेना समझते हैं. पहले लोक सभा में जहां 112 उम्मीदवारों में 40 युवा थे वहीं दूसरी में इनकी संख्या 151 तीसरी में 78 और 14वीं तक आते-आते यह 35 युवा लोगों तक सिमट गयी. आप खुद सोचिए 543 सीटों के पर मात्र 35 युवा उम्मीदवार। और खोज एक यंग राजनीति की. ये महज एक कोरी कल्पना नहीं तो और क्या है. जहां आप(युवा वर्ग) खुद को आगे नहीं लाना चाहते वहां और किस तरह की साफ-सुथरी और भ्रस्ताचार मुक्त शासन की अपेक्षा कर सकते हैं.
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